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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से
फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है

ख़ुमार बाराबंकवी




मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है

ख़ुमार बाराबंकवी




मुझे को महरूमी-ए-नज़ारा क़ुबूल
आप जल्वे न अपने आम करें

ख़ुमार बाराबंकवी




मुझे तो उन की इबादत पे रहम आता है
जबीं के साथ जो सज्दे में दिल झुका न सके

ख़ुमार बाराबंकवी




ओ जाने वाले आ कि तिरे इंतिज़ार में
रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए

ख़ुमार बाराबंकवी




फूल कर ले निबाह काँटों से
आदमी ही न आदमी से मिले

ख़ुमार बाराबंकवी




रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
कट गई उम्र रात बाक़ी है

ख़ुमार बाराबंकवी