ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से
फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
ख़ुमार बाराबंकवी
मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है
ख़ुमार बाराबंकवी
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मुझे को महरूमी-ए-नज़ारा क़ुबूल
आप जल्वे न अपने आम करें
ख़ुमार बाराबंकवी
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मुझे तो उन की इबादत पे रहम आता है
जबीं के साथ जो सज्दे में दिल झुका न सके
ख़ुमार बाराबंकवी
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ओ जाने वाले आ कि तिरे इंतिज़ार में
रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए
ख़ुमार बाराबंकवी
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फूल कर ले निबाह काँटों से
आदमी ही न आदमी से मिले
ख़ुमार बाराबंकवी
रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
कट गई उम्र रात बाक़ी है
ख़ुमार बाराबंकवी
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