हम भी तिरे बेटे हैं ज़रा देख हमें भी
ऐ ख़ाक-ए-वतन तुझ से शिकायत नहीं करते
खुर्शीद अकबर
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जज़ीरे उग रहे हैं पानियों में
मगर पुख़्ता किनारा जा रहा है
खुर्शीद अकबर
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जो दिन है ख़ाक-ए-बयाबाँ जो रात है जंगल
वो बे-पनाह मिरे घर से है ज़ियादा क्या
खुर्शीद अकबर
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कश्ती की तरह तुम मुझे दरिया में उतारो
मैं बीच भँवर में तुम्हें पतवार बनाऊँ
खुर्शीद अकबर
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ख़ुद से लिखने का इख़्तियार भी दे
वर्ना क़िस्मत की तख़्तियाँ ले जा
खुर्शीद अकबर
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ख़ुदा के ग़ाएबाने में किसी दिन
सुनो क्या शहर सारा बोलता है
खुर्शीद अकबर
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लहू तेवर बदलता है कहाँ तक
मिरा बेटा सियाना हो तो देखूँ
खुर्शीद अकबर
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