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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

'ख़ातिर' अब अहल-ए-दिल भी बने हैं ज़माना-साज़
किस से करें वफ़ा की तलब अपने शहर में

ख़ातिर ग़ज़नवी




लोगों ने तो सूरज की चका-चौंद को पूजा
मैं ने तो तिरे साए को भी सज्दा किया है

ख़ातिर ग़ज़नवी




मैं इसे शोहरत कहूँ या अपनी रुस्वाई कहूँ
मुझ से पहले उस गली में मेरे अफ़्साने गए

ख़ातिर ग़ज़नवी




क़तरे की जुरअतों ने सदफ़ से लिया ख़िराज
दरिया समुंदरों में मिले और मर गए

ख़ातिर ग़ज़नवी




सर रख के सो गया हूँ ग़मों की सलीब पर
शायद कि ख़्वाब ले उड़ें हँसती फ़ज़ाओं में

ख़ातिर ग़ज़नवी




तू नहीं पास तिरी याद तो है
तू ही तो सूझे जहाँ तक सोचूँ

ख़ातिर ग़ज़नवी




वहशतें कुछ इस तरह अपना मुक़द्दर बन गईं
हम जहाँ पहुँचे हमारे साथ वीराने गए

ख़ातिर ग़ज़नवी