यहाँ पे दश्त ओ समुंदर की बात मत करना
हमारे शहर का हर शख़्स है मकान-ज़दा
कलीम हैदर शरर
है ज़ेब-ए-गुलू कब से मिरे दार का फंदा
मुजरिम हूँ अगर मैं तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
कलीम उस्मानी
जब किसी ने क़द ओ गेसू का फ़साना छेड़ा
बात बढ़ के रसन-ओ-दार तक आ पहुँची है
कलीम उस्मानी
अब कोई ढूँड-ढाँड के लाओ नया वजूद
इंसान तो बुलंदी-ए-इंसाँ से घट गया
कालीदास गुप्ता रज़ा
अज़ल से ता-ब-अबद एक ही कहानी है
इसी से हम को नई दास्ताँ बनानी है
कालीदास गुप्ता रज़ा
बात अगर न करनी थी क्यूँ चमन में आए थे
रंग क्यूँ बिखेरा था फूल क्यूँ खिलाए थे
कालीदास गुप्ता रज़ा
बहार आई गुलों को हँसी नहीं आई
कहीं से बू तिरी गुफ़्तार की नहीं आई
कालीदास गुप्ता रज़ा

