एक अजीब राग है एक अजीब गुफ़्तुगू
सात सुरों की आग है आठवीं सुर की जुस्तुजू
जमीलुद्दीन आली
एक बिदेसी नार की मोहनी सूरत हम को भाई
और वो पहली नार थी भय्या जो निकली हरजाई
जमीलुद्दीन आली
हर इक बात में डाले है हिन्दू मुस्लिम की बात
ये ना जाने अल्हड़ गोरी प्रेम है ख़ुद इक ज़ात
जमीलुद्दीन आली
इक गहरा सुनसान समुंदर जिस के लाख बहाओ
तड़प रही है उस की इक इक मौज पे जीवन-नाव
जमीलुद्दीन आली
इस दीवानी दौड़ में बच बच जाता था हर बार
इक दोहा सो इसे भी ले जा तू ही ख़ुश रह यार
जमीलुद्दीन आली
जाने क्यूँ लोगों की नज़रें तुझ तक पहुँचें हम ने तो
बरसों ब'अद ग़ज़ल की रौ में इक मज़मून निकाला था
जमीलुद्दीन आली
कच्चे महल की रानी आई रात हमारे पास
होंट पे लाखा गाल पे लाली आँखें बहुत उदास
जमीलुद्दीन आली

