EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

किसे ख़बर थी कि ले कर चिराग़-मुस्तफ़वी
जहाँ में आग लगाती फिरेगी बू-लहबी

जमील मज़हरी




नहीं अफ़्सूँ ही को अफ़्साने की मंज़िल मालूम
ग़लत आग़ाज़ का होता ही है अंजाम ग़लत

जमील मज़हरी




बदलेगी काएनात मिरी बात मान लो
मुझ से मिलाओ हात मिरी बात मान लो

जमील उस्मान




है ज़िंदगी बग़ैर तुम्हारे इक इज़्तिराब
दे दो इसे सबात मिरी बात मान लो

जमील उस्मान




हम राज़-ए-दिल छुपाते मगर अपनी ज़िंदगी
पूरी खुली किताब अगर हो तो क्या करें

जमील उस्मान




किस ने कहा है तुम से कि ता-उम्र साथ दो
है चार दिन की बात मिरी बात मान लो

जमील उस्मान




सो जाइए हुज़ूर कि अब रात हो गई
जो बात होने वाली थी वो बात हो गई

जमील उस्मान