इस क़दर मत उदास हो जैसे
ये मोहब्बत का आख़िरी दिन है
इदरीस बाबर
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काम की बात पूछते क्या हो
कुछ हुआ कुछ नहीं हुआ यानी
इदरीस बाबर
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कहानियों ने मिरी आदतें बिगाड़ी थीं
मैं सिर्फ़ सच को ज़फ़र-याब देख सकता था
इदरीस बाबर
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ख़ुद-कुशी भी नहीं मिरे बस में
लोग बस यूँही मुझ से डरते हैं
इदरीस बाबर
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किधर गया वो कूज़ा-गर ख़बर नहीं
कोई सुराग़ चाक से नहीं मिला
इदरीस बाबर
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कोई भी दिल में ज़रा जम के ख़ाक उड़ाता तो
हज़ार गौहर-ए-नायाब देख सकता था
इदरीस बाबर
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मैं जानता हूँ ये मुमकिन नहीं मगर ऐ दोस्त
मैं चाहता हूँ कि वो ख़्वाब फिर बहम किए जाएँ
इदरीस बाबर
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