हमें उजाल दे फिर देख अपने जल्वों को
हम आइना हैं मगर पर्दा-ए-ग़ुबार में हैं
हयात वारसी
देखने वाले ज़माने का भी हक़ है मुझ पर
सब की नज़रों से छुपा कर मिरी तस्वीर न देख
हज़ार लखनवी
दिल की धड़कन मिरे माथे की शिकन है कि नहीं
रूह-ए-तक़दीर समझ आलम-ए-तक़दीर न देख
हज़ार लखनवी
हो के अफ़्सुर्दा मिरी शूमी-ए-तक़दीर न देख
अपने पैरों में मिरे पाँव की ज़ंजीर न देख
हज़ार लखनवी
आओ मिल बैठ कर हँसें बोलें
नहीं मालूम कब जुदा हो जाएँ
हज़ीं लुधियानवी
जो पा लिया तुझे मैं ख़ुद को ढूँडने निकला
तुम्हारे क़ुर्ब ने भी ज़ख़्म-ए-ना-रसाई दिया
हज़ीं लुधियानवी
नज़र न आई कभी फिर वो गाँव की गोरी
अगरचे मिल गए देहात आ के शहरों से
हज़ीं लुधियानवी

