हक़ारत की निगाहों से न फ़र्श-ए-ख़ाक को देखो
अमीरों का फ़क़ीरों का यही आख़िर को बिस्तर है
हक़ीर
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इश्क़ के फंदे से बचिए ऐ 'हक़ीर'-ए-ख़स्ता-दिल
इस का है आग़ाज़ शीरीं और है अंजाम तल्ख़
हक़ीर
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जानता उस को हूँ दवा की तरह
चाहता उस को हूँ शिफ़ा की तरह
हक़ीर
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जब से कुछ क़ाबू है अपना काकुल-ए-ख़मदार पर
साँप हर दम लोटता है सीना-ए-अग़्यार पर
हक़ीर
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खुली जो आँख मिरी सामना क़ज़ा से हुआ
जो आँख बंद हुई साबिक़ा ख़ुदा से हुआ
हक़ीर
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ख़ूब मिल कर गले से रो लेना
इस से दिल की सफ़ाई होती है
हक़ीर
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की किसी पर न जफ़ा मेरे बा'द
ख़ूब रोए वो सुना मेरे बा'द
हक़ीर
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