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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

बाग़ में होना ही शायद सेब की पहचान थी
अब कि वो बाज़ार में है अब तो बिकना है उसे

हकीम मंज़ूर




छोड़ कर बार-ए-सदा वो बे-सदा हो जाएगा
वहम था मेरा कि पत्थर आईना हो जाएगा

हकीम मंज़ूर




देखते हैं दर-ओ-दीवार हरीफ़ाना मुझे
इतना बे-बस भी कहाँ होगा कोई घर में कभी

हकीम मंज़ूर




गिरेगी कल भी यही धूप और यही शबनम
इस आसमाँ से नहीं और कुछ उतरने का

हकीम मंज़ूर




हम किसी बहरूपिए को जान लें मुश्किल नहीं
उस को क्या पहचानिये जिस का कोई चेहरा न हो

हकीम मंज़ूर




हर एक आँख को कुछ टूटे ख़्वाब दे के गया
वो ज़िंदगी को ये कैसा अज़ाब दे के गया

हकीम मंज़ूर




इतना बदल गया हूँ कि पहचानने मुझे
आएगा वो तो ख़ुद से गुज़र कर ही आएगा

हकीम मंज़ूर