कुछ मिरी बे-क़रारियाँ कुछ मिरी ना-तवानियाँ
कुछ तिरी रहमतों का है हाथ मिरे गुनाह में
हैरत गोंडवी
मुझे ऐ रहनुमा अब छोड़ तन्हा
मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ
हैरत गोंडवी
रह रह के कौंदती हैं अंधेरे में बिजलियाँ
तुम याद कर रहे हो कि याद आ रहे हो तुम
हैरत गोंडवी
जो चल पड़े थे अज़्म-ए-सफ़र ले के थक गए
जो लड़खड़ा रहे थे वो मंज़िल पे आए हैं
हैरत सहरवर्दी
क्या मालूम किसी की मुश्किल
ख़ुद-दारी है या ख़ुद-बीनी
हैरत शिमलवी
अगरचे उस की हर इक बात खुरदुरी है बहुत
मुझे पसंद है ढंग उस के बात करने का
हकीम मंज़ूर
अपनी नज़र से टूट कर अपनी नज़र में गुम हुआ
वो बड़ा बा-शुऊर था अपने ही घर में गुम हुआ
हकीम मंज़ूर

