काबा के ढाने वाले वो और लोग होंगे
हम कुफ़्र जानते हैं दिल तोड़ना किसी का
हफ़ीज़ जौनपुरी
काफ़िर-ए-इश्क़ को क्या दैर-ओ-हरम से मतलब
जिस तरफ़ तू है उधर ही हमें सज्दा करना
हफ़ीज़ जौनपुरी
कभी मस्जिद में जो वाइज़ का बयाँ सुनता हूँ
याद आती है मुझे पीर-ए-ख़राबात की बात
हफ़ीज़ जौनपुरी
लुट गया वो तिरे कूचे में धरा जिस ने क़दम
इस तरह की भी कहीं राहज़नी होती है
हफ़ीज़ जौनपुरी
मिरे बुत-ख़ाने से हो कर चला जा काबे को ज़ाहिद
ब-ज़ाहिर फ़र्क़ है बातिन में दोनों एक रस्ते हैं
हफ़ीज़ जौनपुरी
मिरी शराब की तौबा पे जा न ऐ वाइज़
नशे की बात नहीं ए'तिबार के क़ाबिल
हफ़ीज़ जौनपुरी
ओ आँख बदल के जाने वाले
कुछ ध्यान किसी की आजिज़ी का
हफ़ीज़ जौनपुरी

