अख़ीर वक़्त है किस मुँह से जाऊँ मस्जिद को
तमाम उम्र तो गुज़री शराब-ख़ाने में
हफ़ीज़ जौनपुरी
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बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा
चले आओ इक दिन टहलते हुए
हफ़ीज़ जौनपुरी
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बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है
हफ़ीज़ जौनपुरी
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बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए
लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए
हफ़ीज़ जौनपुरी
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बुरा ही क्या है बरतना पुरानी रस्मों का
कभी शराब का पीना भी क्या हलाल न था
हफ़ीज़ जौनपुरी
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गया जो हाथ से वो वक़्त फिर नहीं आता
कहाँ उमीद कि फिर दिन फिरें हमारे अब
हफ़ीज़ जौनपुरी
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हाल मेरा भी जा-ए-इबरत है
अब सिफ़ारिश रक़ीब करते हैं
हफ़ीज़ जौनपुरी
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