शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है
गुलज़ार
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तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं
सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं
गुलज़ार
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उसी का ईमाँ बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था
गुलज़ार
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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
गुलज़ार
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वो एक दिन एक अजनबी को
मिरी कहानी सुना रहा था
गुलज़ार
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वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था
गुलज़ार
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यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
सोंधी सोंधी लगती है तब माज़ी की रुस्वाई भी
गुलज़ार

