जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है
गुलज़ार
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काँच के पार तिरे हाथ नज़र आते हैं
काश ख़ुशबू की तरह रंग हिना का होता
गुलज़ार
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कभी तो चौंक के देखे कोई हमारी तरफ़
किसी की आँख में हम को भी इंतिज़ार दिखे
गुलज़ार
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कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है
गुलज़ार
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ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी थी
उन की बात सुनी भी हम ने अपनी बात सुनाई भी
गुलज़ार
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ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में
गुलज़ार
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कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
गुलज़ार
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