मीर के बाद ग़ालिब ओ इक़बाल
इक सदा, इक सदी में गुज़री है
गुलज़ार देहलवी
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उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है
बस वही आगही में गुज़री है
गुलज़ार देहलवी
सद-साला दौर-ए-चर्ख़ था साग़र का एक दौर
निकले जो मय-कदे से तो दुनिया बदल गई
गुस्ताख़ रामपुरी
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धरती और अम्बर पर दोनों क्या रानाई बाँट रहे थे
फूल खिला था तन्हा तन्हा चाँद उगा था तन्हा तन्हा
ग्यान चन्द
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फ़िक्र की दुनिया में कोलम्बस बना फिरता हूँ मैं
इल्म की पहनाई का कितना बड़ा फ़ैज़ान है
ग्यान चन्द
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चाहते भी हैं चाहते भी नहीं
दोस्ती की नई मिसाल है ये
हबाब तिर्मिज़ी
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आफ़ियत की उम्मीद क्या कि अभी
दिल-ए-उम्मीद-वार बाक़ी है
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
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