कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
गुलज़ार
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मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है
गुलज़ार
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फिर वहीं लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रिहाई दी है
गुलज़ार
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राख को भी कुरेद कर देखो
अभी जलता हो कोई पल शायद
गुलज़ार
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रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे
धूप उन्डेलो थोड़ी सी पैमाने में
गुलज़ार
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रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
क़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले
गुलज़ार
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सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है
गुलज़ार
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