कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता
ग़म में शामिल ख़ुशी सी रहती है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कुछ ऐसे देखता है वो मुझे कि लगता है
दिखा रहा है मुझे मेरा आइना कुछ और
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मैं तिरे वास्ते आईना था
अपनी सूरत को तरस अब क्या है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मेरी कश्ती को डुबो कर चैन से बैठे न तू
ऐ मिरे दरिया! हमेशा तुझ में तुग़्यानी रहे
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मेरी पहचान बताने का सवाल आया जब
आइनों ने भी हक़ीक़त से मुकरना चाहा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
न जाने क़ैद में हूँ या हिफ़ाज़त में किसी की
खिंची है हर तरफ़ इक चार दीवारी सी कोई
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
पहले चिंगारी उड़ा लाई हवा
ले के अब राख उड़ी जाती है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

