झाँकता भी नहीं सूरज मिरे घर के अंदर
बंद भी कोई दरीचा नहीं रहने देता
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
जो उस तरफ़ से इशारा कभी किया उस ने
मैं डूब जाऊँगा दरिया को पार करते हुए
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कहाँ तक उस की मसीहाई का शुमार करूँ
जहाँ है ज़ख़्म वहीं इंदिमाल है उस का
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कैसा इंसाँ तरस रहा है जीने को
कैसे साहिल पर इक मछली ज़िंदा है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
किसी की राह में आने की ये भी सूरत है
कि साया के लिए दीवार हो लिया जाए
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
किसी ने भेज कर काग़ज़ की कश्ती
बुलाया है समुंदर पार मुझ को
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कितना भी रंग-ओ-नस्ल में रखते हों इख़्तिलाफ़
फिर भी खड़े हुए हैं शजर इक क़तार में
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

