अपनी तस्वीर के इक रुख़ को निहाँ रखता है
ये चराग़ अपना धुआँ जाने कहाँ रखता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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चाहता है वो कि दरिया सूख जाए
रेत का व्यापार करना चाहता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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चले थे जिस की तरफ़ वो निशान ख़त्म हुआ
सफ़र अधूरा रहा आसमान ख़त्म हुआ
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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देखने सुनने का मज़ा जब है
कुछ हक़ीक़त हो कुछ फ़साना हो
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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दिल ने तमन्ना की थी जिस की बरसों तक
ऐसे ज़ख़्म को अच्छा कर के बैठ गए
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
दूसरा कोई तमाशा न था ज़ालिम के पास
वही तलवार थी उस की वही सर था मेरा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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एक दिन दरिया मकानों में घुसा
और दीवारें उठा कर ले गया
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
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