पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
और फिर पूरी काएनात बना
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
प्यार गया तो कैसे मिलते रंग से रंग और ख़्वाब से ख़्वाब
एक मुकम्मल घर के अंदर हर तस्वीर अधूरी थी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सायों की ज़द में आ गईं सारी ग़ुलाम-गर्दिशें
अब तो कनीज़ के लिए राह-ए-फ़रार भी नहीं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सब से अच्छा कह के उस ने मुझ को रुख़्सत कर दिया
जब यहां आया तो फिर सब से बुरा भी मैं ही था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सोचा है तुम्हारी आँखों से अब मैं उन को मिलवा ही दूँ
कुछ ख़्वाब जो ढूँडते फिरते हैं जीने का सहारा आँखों में
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तुम यूँ ही नाराज़ हुए हो वर्ना मय-ख़ाने का पता
हम ने हर उस शख़्स से पूछा जिस के नैन नशीले थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

