ज़िंदगी ख़ुद को न इस रूप में पहचान सकी
आदमी लिपटा है ख़्वाबों के कफ़न में ऐसा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
'साबिर' तेरा कलाम सुनें क्यूँ न अहल-ए-फ़न
बंदिश अजब है और अजब बोल चाल है
फ़ज़ल हुसैन साबिर
शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ 'साबिर'
जहाँ में मिस्ल-ए-नसीम-ए-बहार हम भी हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
तुम ने क्यूँ दिल में जगह दी है बुतों को 'साबिर'
तुम ने क्यूँ काबा को बुत-ख़ाना बना रक्खा है
फ़ज़ल हुसैन साबिर
तू जफ़ाओं से जो बदनाम किए जाता है
याद आएगी तुझे मेरी वफ़ा मेरे बाद
फ़ज़ल हुसैन साबिर
उन की मानिंद कोई साहब-ए-इदराक कहाँ
जो फ़रिश्ते नहीं समझे वो बशर समझे हैं
फ़ज़ल हुसैन साबिर
अब कौन जा के साहिब-ए-मिम्बर से ये कहे
क्यूँ ख़ून पी रहा है सितमगर शराब पी
फ़ाज़िल जमीली

