तुझे हवस हो जो मुझ को हदफ़ बनाने की
मुझे भी तीर की सूरत कमाँ में रख देना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
तू है मअ'नी पर्दा-ए-अल्फ़ाज़ से बाहर तो आ
ऐसे पस-मंज़र में क्या रहना सर-ए-मंज़र तो आ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
उस की क़ुर्बत का नशा क्या चीज़ है
हाथ फिर जलते तवे पर रख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
वक़्त ने किस आग में इतना जलाया है मुझे
जिस क़दर रौशन था मैं उस से सिवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
वो मेल-जोल हुस्न ओ बसीरत में अब कहाँ
जो सिलसिला था फूल का पत्थर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ये तमाशा दीदनी ठहरा मगर देखेगा कौन
हो गए हम राख तो दस्त-ए-दुआ रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
यूँ मआनी से बहुत ख़ास है रिश्ता अपना
ज़िंदगी कट गई लफ़्ज़ों को ख़बर करने में
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

