किसी लम्हे तो ख़ुद से ला-तअल्लुक़ भी रहो लोगो
मसाइल कम नहीं फिर ज़िंदगी भर सोचते रहना
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
लोग मुझ को मिरे आहंग से पहचान गए
कौन बदनाम रहा शहर-ए-सुख़न में ऐसा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
मुझे तराश के रख लो कि आने वाला वक़्त
ख़ज़फ़ दिखा के गुहर की मिसाल पूछेगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
नुत्क़ से लब तक है सदियों का सफ़र
ख़ामुशी ये दुख भला झेलेगी क्या
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
पलकों पर अपनी कौन मुझे अब सजाएगा
मैं हूँ वो रंग जो तिरे पैकर से कट गया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
शख़्सियत का ये तवाज़ुन तेरा हिस्सा है 'फ़ज़ा'
जितनी सादा है तबीअत उतना ही तीखा हुनर
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
तलाश-ए-मअ'नी-ए-मक़्सूद इतनी सहल न थी
मैं लफ़्ज़ लफ़्ज़ उतरता गया बहुत गहरा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

