रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम
हर बात में क़ुरआन उठाया नहीं जाता
सख़ी लख़नवी
नक़्द-ए-दिल का बड़ा तक़ाज़ा है
गोया उन की ज़मीं जोते हैं
सख़ी लख़नवी
न छोड़ा हिज्र में भी ख़ाना-ए-तन
रगड़वाएगी कब तक एड़ियाँ रूह
सख़ी लख़नवी
न आशिक़ हैं ज़माने में न माशूक़
इधर हम रह गए हैं और उधर आप
सख़ी लख़नवी
मिरे लाशे को कांधा दे के बोले
चलो तुर्बत में अब तुम को सुलाएँ
सख़ी लख़नवी
मैं तुझे फिर ज़मीं दिखाऊँगा
देख मुझ से न आसमान बिगड़
सख़ी लख़नवी
ली ज़बाँ उस की जो मुँह में हो गया ज़ौक़-ए-नबात
उँगलियाँ चूसीं तो ज़ौक़-ए-नैशकर पैदा हुआ
सख़ी लख़नवी
क्यूँ हसीनों की आँखों से न लड़े
मेरी पुतली की मर्दुमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
क्या आतिश-ए-फ़ुर्क़त ने बुरी पाई है तासीर
इस आग से पानी भी बुझाया नहीं जाता
सख़ी लख़नवी

