न छोड़ा हिज्र में भी ख़ाना-ए-तन
रगड़वाएगी कब तक एड़ियाँ रूह
सख़ी लख़नवी
रहते काबे में अकेले क्या हम
दिल लगाने को सनम भी तो न थे
सख़ी लख़नवी
रंगत उस रुख़ की गुल ने पाई है
और पसीने की बू गुलाब में है
सख़ी लख़नवी
क़ाफ़िला जाता है साग़र की तरफ़ रिंदों का
है मगर क़ुलक़ुल-ए-मीना जरस-ए-जाम-ए-शराब
सख़ी लख़नवी
पूजना बुत का है ये क्या मज़मून
और तवाफ़-ए-हरम के क्या मअनी
सख़ी लख़नवी
नज़'अ के दम भी उन्हें हिचकी न आएगी कभी
यूँही गर भूले रहेंगे वो 'सख़ी' की याद को
सख़ी लख़नवी
नक़्द-ए-दिल का बड़ा तक़ाज़ा है
गोया उन की ज़मीं जोते हैं
सख़ी लख़नवी
क्यूँ हसीनों की आँखों से न लड़े
मेरी पुतली की मर्दुमी ही तो है
सख़ी लख़नवी
ली ज़बाँ उस की जो मुँह में हो गया ज़ौक़-ए-नबात
उँगलियाँ चूसीं तो ज़ौक़-ए-नैशकर पैदा हुआ
सख़ी लख़नवी

