EN اردو
ख़ुर्शीद तलब शायरी | शाही शायरी

ख़ुर्शीद तलब शेर

21 शेर

कोई चराग़ जलाता नहीं सलीक़े से
मगर सभी को शिकायत हवा से होती है

ख़ुर्शीद तलब




कि हम बने ही न थे एक दूसरे के लिए
अब इस यक़ीन को जीना हयात करते हुए

ख़ुर्शीद तलब




आइए बीच की दीवार गिरा देते हैं
कब से इक मसअला बे-कार में उलझा हुआ है

ख़ुर्शीद तलब




कहीं भी जाएँ किसी शहर में सुकूनत हो
हम अपनी तर्ज़ की आब ओ हवा बनाते हैं

ख़ुर्शीद तलब




कभी दिमाग़ को ख़ातिर में हम ने लाया नहीं
हम अहल-ए-दिल थे हमेशा रहे ख़सारे में

ख़ुर्शीद तलब




हवा तो है ही मुख़ालिफ़ मुझे डराता है क्या
हवा से पूछ के कोई दिए जलाता है क्या

ख़ुर्शीद तलब




हवा से कह दो कि कुछ देर को ठहर जाए
ख़जिल हमारी इबारत हवा से होती है

ख़ुर्शीद तलब




हर एक अहद ने लिक्खा है अपना नामा-ए-शौक़
किसी ने ख़ूँ से लिखा है किसी ने आँसू से

ख़ुर्शीद तलब




हमें हर वक़्त ये एहसास दामन-गीर रहता है
पड़े हैं ढेर सारे काम और मोहलत ज़रा सी है

ख़ुर्शीद तलब