मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं
whether or not accepted, it is up to fate
at her doorstep on and on, I myself prostrate
जोश मलसियानी
आमाल की पुर्सिश न कर ऐ दावर-ए-महशर
मजबूर तो मुख़्तार कभी हो नहीं सकता
जोश मलसियानी
जिस को तुम भूल गए याद करे कौन उस को
जिस को तुम याद हो वो और किसे याद करे
him whom you have forgotten who else will recall
he who thinks of you will think of no one else at all
जोश मलसियानी
झुकती है निगाह उस की मुझ से मिल कर
दीवार से धूप उतर रही है गोया
जोश मलसियानी
इश्क़ उस दर्द का नहीं क़ाइल
जो मुसीबत की इंतिहा न हुआ
जोश मलसियानी
इस वहम से कि नींद में आए न कुछ ख़लल
अहबाब ज़ेर-ए-ख़ाक सुला कर चले गए
जोश मलसियानी
गिला ना-मेहरबानी का तो सब से सुन लिया तुम ने
तुम्हारी मेहरबानी की शिकायत हम भी रखते हैं
जोश मलसियानी
डूब जाते हैं उमीदों के सफ़ीने इस में
मैं न मानूँगा कि आँसू है ज़रा सा पानी
when hope and aspirations drown in them so easily
that tears are just some water, how can I agree
जोश मलसियानी
और होते हैं जो महफ़िल में ख़मोश आते हैं
आँधियाँ आती हैं जब हज़रत-ए-'जोश' आते हैं
जोश मलसियानी

