रोज़ आसेब आते जाते हैं
ऐसा क्या है ग़रीब-ख़ाने में
फ़ैसल अजमी
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शजर से बिछड़ा हुआ बर्ग-ए-ख़ुश्क हूँ 'फ़ैसल'
हवा ने अपने घराने में रख लिया है मुझे
फ़ैसल अजमी
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तू ख़्वाब-ए-दिगर है तिरी तदफ़ीन कहाँ हो
दिल में तो किसी और को दफ़नाया हुआ है
फ़ैसल अजमी
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टूटता है तो टूट जाने दो
आइने से निकल रहा हूँ मैं
फ़ैसल अजमी
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उस को जाने दे अगर जाता है
ज़हर कम हो तो उतर जाता है
फ़ैसल अजमी
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जिसे कल रात भर पूजा गया था
वो बुत क्यूँ सुब्ह को टूटा हुआ था
फ़ैसल अज़ीम
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दर्द ने दिल की परवरिश की है
दर्द ही शेर से अदा होगा
फ़ैसल सईद ज़िरग़ाम
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