कहा फ़लक ने ये उड़ते हुए परिंदों से
ज़मीं पे लोग मकानों में क़ैद रहते हैं
फ़ैसल सईद ज़िरग़ाम
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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के ब'अद आए जो अज़ाब आए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान
भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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''आप की याद आती रही रात भर''
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें
रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अदा-ए-हुस्न की मासूमियत को कम कर दे
गुनाहगार-ए-नज़र को हिजाब आता है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अगर शरर है तो भड़के जो फूल है तो खिले
तरह तरह की तलब तेरे रंग-ए-लब से है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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