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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

दर खोल के देखूँ ज़रा इदराक से बाहर
ये शोर सा कैसा है मिरी ख़ाक से बाहर

एजाज़ गुल




धूप जवानी का याराना अपनी जगह
थक जाता है जिस्म तो साया माँगता है

एजाज़ गुल




दिनों महीनों आँखें रोईं नई रुतों की ख़्वाहिश में
रुत बदली तो सूखे पत्ते दहलीज़ों में दर आए

एजाज़ गुल




हैरत है सब तलाश पे उस की रहे मुसिर
पाया गया सुराग़ न जिस बे-सुराग़ का

एजाज़ गुल




हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई था अगर
फिर ये हंगामा मुलाक़ात से पहले क्या था

एजाज़ गुल




हवा के खेल में शिरकत के वास्ते मुझ को
ख़िज़ाँ ने शाख़ से फेंका है रहगुज़ार के बीच

एजाज़ गुल




हो नहीं पाया है समझौता कभी दोनों के बीच
झूट अंदर से है सच बाहर से उकताया हुआ

एजाज़ गुल