दो तरफ़ था हुजूम सदियों का
एक लम्हा सा दरमियाँ मैं था
एजाज़ आज़मी
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मैं वहाँ हूँ जहाँ नहीं कोई
कुछ नहीं था जहाँ वहाँ मैं था
एजाज़ आज़मी
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अजीब शख़्स था मैं भी भुला नहीं पाया
किया न उस ने भी इंकार याद आने से
एजाज़ गुल
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अतवार उस के देख के आता नहीं यक़ीं
इंसाँ सुना गया है कि आफ़ाक़ में रहा
एजाज़ गुल
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बे-सबब जम'अ तो करता नहीं तीर ओ तरकश
कुछ हदफ़ होगा ज़माने की सितमगारी का
एजाज़ गुल
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बुझी नहीं मिरे आतिश-कदे की आग अभी
उठा नहीं है बदन से धुआँ कहाँ गया मैं
एजाज़ गुल
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चाहा था मफ़र दिल ने मगर ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर
पेचाक बनाती रही पेचाक से बाहर
एजाज़ गुल
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