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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रह गए लाखों कलेजा थाम कर
आँख जिस जानिब तुम्हारी उठ गई

दाग़ देहलवी




रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

दाग़ देहलवी




रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैं
उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है

दाग़ देहलवी




रूह किस मस्त की प्यासी गई मय-ख़ाने से
मय उड़ी जाती है साक़ी तिरे पैमाने से

दाग़ देहलवी




साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

दाग़ देहलवी




साथ शोख़ी के कुछ हिजाब भी है
इस अदा का कहीं जवाब भी है

दाग़ देहलवी




साज़ ये कीना-साज़ क्या जानें
नाज़ वाले नियाज़ क्या जानें

दाग़ देहलवी