मुझ को मज़ा है छेड़ का दिल मानता नहीं
गाली सुने बग़ैर सितम-गर कहे बग़ैर
दाग़ देहलवी
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मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते
दाग़ देहलवी
न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते
दाग़ देहलवी
न रोना है तरीक़े का न हँसना है सलीक़े का
परेशानी में कोई काम जी से हो नहीं सकता
दाग़ देहलवी
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न समझा उम्र गुज़री उस बुत-ए-काफ़र को समझाते
पिघल कर मोम हो जाता अगर पत्थर को समझाते
दाग़ देहलवी
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नासेह ने मेरा हाल जो मुझ से बयाँ किया
आँसू टपक पड़े मिरे बे-इख़्तियार आज
दाग़ देहलवी
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ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर
आरज़ू की आरज़ू होने लगी
दाग़ देहलवी

