उम्मीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती
वा'दा न वफ़ा करते वा'दा तो किया होता
चराग़ हसन हसरत
या-रब ग़म-ए-हिज्राँ में इतना तो किया होता
जो हाथ जिगर पर है वो दस्त-ए-दुआ होता
चराग़ हसन हसरत
दिन तो शिकम की आग बुझाने में जाए है
शुक्र-ए-ख़ुदा कि कटती है दानिशवरों में रात
दाएम ग़व्वासी
गुफ़्तुगू में वो हलावत वो अमल में इख़्लास
उस की हस्ती पे फ़रिश्ते का गुमाँ हो जैसे
दाएम ग़व्वासी
आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा
दाग़ देहलवी
आप पछताएँ नहीं जौर से तौबा न करें
आप के सर की क़सम 'दाग़' का हाल अच्छा है
दाग़ देहलवी
आती है बात बात मुझे बार बार याद
कहता हूँ दौड़ दौड़ के क़ासिद से राह में
दाग़ देहलवी

