ये उन का खेल तो देखो कि एक काग़ज़ पर
लिखा भी नाम मिरा और फिर मिटा भी दिया
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म
दिल की आवाज़ अजब दर्द भरी आती है
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
अब दिल को समझाए कौन
बात अगरचे है माक़ूल
बासिर सुल्तान काज़मी
अपनी बातों के ज़माने तो हवा-बुर्द हुए
अब किया करते हैं हम सूरत-ए-हालात पे बात
बासिर सुल्तान काज़मी
बढ़ गई तुझ से मिल के तन्हाई
रूह जूया-ए-हम-सुबू थी बहुत
बासिर सुल्तान काज़मी
'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं
बीमार हो? पड़े रहो, मर भी गए तो क्या
बासिर सुल्तान काज़मी
चमकी थी एक बर्क़ सी फूलों के आस-पास
फिर क्या हुआ चमन में मुझे कुछ ख़बर नहीं
बासिर सुल्तान काज़मी

