ख़ुद-फ़रेबी सी ख़ुद-फ़रेबी है
पास के ढोल भी सुहाने लगे
बाक़ी सिद्दीक़ी
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कुछ न पा कर भी मुतमइन हैं हम
इश्क़ में हाथ क्या ख़ज़ाने लगे
बाक़ी सिद्दीक़ी
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पहले हर बात पे हम सोचते थे
अब फ़क़त हाथ उठा देते हैं
बाक़ी सिद्दीक़ी
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राज़-ए-सर-बस्ता है महफ़िल तेरी
जो समझ लेगा वो तन्हा होगा
बाक़ी सिद्दीक़ी
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रहने दो कि अब तुम भी मुझे पढ़ न सकोगे
बरसात में काग़ज़ की तरह भीग गया हूँ
बाक़ी सिद्दीक़ी
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तेरे ग़म से तो सुकून मिलता है
अपने शोलों ने जलाया हम को
बाक़ी सिद्दीक़ी
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तेरी हर बात पे चुप रहते हैं
हम सा पत्थर भी कोई क्या होगा
बाक़ी सिद्दीक़ी
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