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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

ख़ुदा का शुक्र है तू ने भी मान ली मिरी बात
रफ़ू पुराने दुखों पर नहीं किया जाता

अज़ीज़ हामिद मदनी




खुला ये दिल पे कि तामीर-ए-बाम-ओ-दर है फ़रेब
बगूले क़ालिब-ए-दीवार-ओ-दर में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी




ख़ूँ हुआ दिल कि पशीमान-ए-सदाक़त है वफ़ा
ख़ुश हुआ जी कि चलो आज तुम्हारे हुए लोग

अज़ीज़ हामिद मदनी




कुछ अब के हम भी कहें उस की दास्तान-ए-विसाल
मगर वो ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ खुले तो बात चले

अज़ीज़ हामिद मदनी




माना कि ज़िंदगी में है ज़िद का भी एक मक़ाम
तुम आदमी हो बात तो सुन लो ख़ुदा नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी




महक में ज़हर की इक लहर भी ख़्वाबीदा रहती है
ज़िदें आपस में टकराती हैं फ़र्क़-ए-मार-ओ-संदल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी




मेरी वफ़ा है उस की उदासी का एक बाब
मुद्दत हुई है जिस से मुझे अब मिले हुए

अज़ीज़ हामिद मदनी