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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मिरा चाक-ए-गिरेबाँ चाक-ए-दिल से मिलने वाला है
मगर ये हादसे भी बेश ओ कम होते ही रहते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी




मुबहम से एक ख़्वाब की ताबीर का है शौक़
नींदों में बादलों का सफ़र तेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी




नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है
ऐ हम-सफ़ीर आतिश-ए-गुल तेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी




सदियों में जा के बनता है आख़िर मिज़ाज-ए-दहर
'मदनी' कोई तग़य्युर-ए-आलम है बे-सबब

अज़ीज़ हामिद मदनी




शहर जिन के नाम से ज़िंदा था वो सब उठ गए
इक इशारे से तलब करता है वीराना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी




सुब्ह से चलते चलते आख़िर शाम हुई आवारा-ए-दिल
अब मैं किस मंज़िल में पहुँचा अब घर कितनी दूर रहा

अज़ीज़ हामिद मदनी




सुलग रहा है उफ़ुक़ बुझ रही है आतिश-ए-महर
रुमूज़-ए-रब्त-ए-गुरेज़ाँ खुले तो बात चले

अज़ीज़ हामिद मदनी