ये जो रहते हैं बहुत मौज में शब भर हम लोग
सुब्ह होते ही किनारे पे पड़े होते हैं
अज़हर फ़राग़
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ये कच्चे सेब चबाने में इतने सहल नहीं
हमारा सब्र न करना भी एक हिम्मत है
अज़हर फ़राग़
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ये ख़मोशी मिरी ख़मोशी है
इस का मतलब मुकालिमा लिया जाए
अज़हर फ़राग़
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ये लोग जा के कटी बोगियों में बैठ गए
समय को रेल की पटरी के साथ चलने दिया
अज़हर फ़राग़
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ये नहीं देखते कितनी है रियाज़त किस की
लोग आसान समझ लेते हैं आसानी को
अज़हर फ़राग़
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बस रंज की है दास्ताँ उन्वान हज़ारों
जीने के लिए मर गए इंसान हज़ारों
अज़हर हाश्मी
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दवाम पाएगा इक रोज़ हक़ ज़माने में
ये इंतिज़ार नहीं इंतिज़ार-ए-वहशत है
अज़हर हाश्मी
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