देखा नहीं जिस ने मिरे तूफ़ाँ को सुकूँ में
वो शख़्स मिरी रूह के अंदर नहीं उतरा
अज़हर हाश्मी
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गुमान कहता है के मैं यक़ीं का शाइ'र हूँ
यक़ीन कहता है के मैं गुमाँ का शाइ'र हूँ
अज़हर हाश्मी
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इतनी न इंतिशार की हिद्दत हो रू-ब-रू
इंसाँ ग़म-ए-हयात में जलता दिखाई दे
अज़हर हाश्मी
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जिस ख़ाक से कहते हो वफ़ा हम नहीं करते
सोए हैं उसी ख़ाक में सुल्तान हज़ारों
अज़हर हाश्मी
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कहीं सुराग़ नहीं है किसी भी क़ातिल का
लहूलुहान मगर शहर का नज़ारा है
अज़हर हाश्मी
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ख़ुदा की रज़ा है न हासिल किसी को
ख़ुदा के लिए पर लड़ाई बहुत है
अज़हर हाश्मी
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कोई हयात ज़माने को है अज़ीज़ बहुत
कोई हयात है कि रोज़ रोज़ मरती है
अज़हर हाश्मी
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