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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

घर हमारा फूँक कर कल इक पड़ोसी ऐ 'अतीक़'
दो घड़ी तो हँस लिया फिर बाद में रोया बहुत

अतीक़ इलाहाबादी




होंटों पर इक बार सजा कर अपने होंट
उस के बाद न बातें करना सो जाना

अतीक़ इलाहाबादी




मैं ने पूछा ये बता मुझ से बिछड़ने का तुझे
कुछ क़लक़ होता है क्या उस ने कहा थोड़ा बहुत

अतीक़ इलाहाबादी




नवाज़ता था हमेशा वो ग़म की दौलत से
और इस ख़ज़ाने से मैं माला माल हो ही गया

अतीक़ इलाहाबादी




अश्क पलकों पे बिछड़ कर अपनी क़ीमत खो गया
ये सितारा क़ीमती था जब तलक टूटा न था

अतीक़ अंज़र




बिछड़ते वक़्त अना दरमियान थी वर्ना
मनाना दोनों ने इक दूसरे को चाहा था

अतीक़ अंज़र




दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के
तेरी याद की ख़ुश्बू दिल में जब ठहरती है

अतीक़ अंज़र