निगाह-ए-नाज़ की मासूमियत अरे तौबा
जो हम फ़रेब न खाते तो और क्या करते
अर्शी भोपाली
हमारी महफ़िलों में बे-हिजाब आने से क्या होगा
नहीं जब होश में हम जल्वा फ़रमाने से क्या होगा
अर्शी रामपुरी
आप अपने से बरहमी कैसी
मैं नहीं कोई और है ये भी
आरज़ू लखनवी
'आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी
पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई
आरज़ू लखनवी
अल्लाह अल्लाह हुस्न की ये पर्दा-दारी देखिए
भेद जिस ने खोलना चाहा वो दीवाना हुआ
आरज़ू लखनवी
अपनी अपनी गर्दिश-ए-रफ़्तार पूरी कर तो लें
दो सितारे फिर किसी दिन एक जा हो जाएँगे
आरज़ू लखनवी
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ भी थी परवाना भी
रात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
आरज़ू लखनवी

