हमें मिट के भी ये हसरत कि भटकते उस गली में
वो हैं कैसे लोग या रब जो क़याम चाहते हैं
अरशद सिद्दीक़ी
हो इंतिज़ार किसी का मगर मिरी नज़रें
न जाने क्यूँ तिरी आमद की राह तकती हैं
अरशद सिद्दीक़ी
अजीब चीज़ है ये शौक़-ए-आरज़ू-मंदी
हयात मिट के रही दिल ख़राब हो के रहा
अर्शी भोपाली
बहुत अज़ीज़ न क्यूँ हो कि दर्द है तेरा
ये दर्द बढ़ के रहा इज़्तिराब हो के रहा
अर्शी भोपाली
हम तो आवारा-ए-सहरा हैं हमें क्या मतलब
उन की महफ़िल में जुनूँ की कोई तौक़ीर सही
अर्शी भोपाली
हमें तो अपनी तबाही की दाद भी न मिली
तिरी नवाज़िश-ए-बेजा का क्या गिला करते
अर्शी भोपाली
मौक़ूफ़ फ़स्ल-ए-गुल पे नहीं रौनक़-ए-चमन
नज़रें जवान हों तो ख़िज़ाँ भी बहार है
अर्शी भोपाली

