याद की ख़ुशबू दिल के नगर में फैलेगी
ग़म के साए लगते हैं अब शीतल से
अनवर मीनाई
ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए
इक चाँद फ़लक पर निकला हो इक चाँद सर-ए-बाम आ जाए
अनवर मिर्ज़ापुरी
अकेला पा के मुझ को याद उन की आ तो जाती है
मगर फिर लौट कर जाती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ
अनवर मिर्ज़ापुरी
मैं ख़ुश हूँ अगर गुलशन के लिए कुछ मेरा लहू काम आ जाए
लेकिन मुझ को डर है इस का गुलचीं पे न इल्ज़ाम आ जाए
अनवर मिर्ज़ापुरी
हो सकता है कोई हमें भी ढूँडे इन बंजारों में
जाने किस की खोज में कब से फिरते हैं बाज़ारों में
अनवर नदीम
मेरे कमरे में सभी चीज़ें हैं आज
ज़िंदगानी की तरह बिखरी हुई
अनवर नदीम
आदमियत के सिवा जिस का कोई मक़्सद न हो
उम्र भर उस आदमी की जुस्तुजू करते रहो
अनवर साबरी

