इतना सन्नाटा है कुछ बोलते डर लगता है
साँस लेना भी दिल ओ जाँ पे गिराँ है अब के
अनवर महमूद खालिद
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
पराई आग में क्यूँ उँगलियाँ जलाऊँ मैं
अनवर महमूद खालिद
आँखों में घुल न जाएँ कहीं ज़ुल्मतों के रंग
जिस सम्त रौशनी है उधर देखते रहो
अनवर मोअज़्ज़म
आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ
किस महफ़िल का नाम है मक़्तल खिंचती है शमशीर कहाँ
अनवर मोअज़्ज़म
धुआँ उठता नज़र आता है हर-सू
अभी आबाद है वीराना दिल का
अनवर मोअज़्ज़म
दिलों की आग बढ़ाओ कि लोग कहते हैं
चराग़-ए-हुस्न से रौशन जहाँ नहीं होता
अनवर मोअज़्ज़म
एक आवाज़ तो गूँजी थी उफ़ुक़-ता-ब-उफ़ुक़
कारवाँ गुम है कहाँ गर्द-ए-सफ़र से पूछो
अनवर मोअज़्ज़म

