वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी की निगाह में
अमीर मीनाई
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ये भी इक बात है अदावत की
रोज़ा रक्खा जो हम ने दावत की
अमीर मीनाई
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ये कहूँगा ये कहूँगा ये अभी कहते हो
सामने उन के भी जब हज़रत-ए-दिल याद रहे
अमीर मीनाई
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ज़ाहिद उमीद-ए-रहमत-ए-हक़ और हज्व-ए-मय
पहले शराब पी के गुनाह-गार भी तो हो
अमीर मीनाई
ज़ब्त देखो उधर निगाह न की
मर गए मरते मरते आह न की
अमीर मीनाई
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ज़ीस्त का ए'तिबार क्या है 'अमीर'
आदमी बुलबुला है पानी का
अमीर मीनाई
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आइने से नज़र चुराते हैं
जब से अपना जवाब देखा है
अमीर क़ज़लबाश
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