शायद सवाब तुम को भी मिल जाए सब के साथ
सज्दे में गिर भी जाओ दुआ की किसे ख़बर
संदीप कोल नादिम
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शायद सवाब तुम को भी मिल जाए सब के साथ
सज्दे में गिर भी जाओ दुआ की किसे ख़बर
संदीप कोल नादिम
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दर-ब-दर होने से पहले कभी सोचा भी न था
घर मुझे रास न आया तो किधर जाऊँगा
साक़ी अमरोहवी
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ख़्वाब था या शबाब था मेरा
दो सवालों का इक जवाब हूँ मैं
साक़ी अमरोहवी
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कितने ही ग़म निखरने लगते हैं
एक लम्हे की शादमानी से
साक़ी अमरोहवी
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कितने ही ग़म निखरने लगते हैं
एक लम्हे की शादमानी से
साक़ी अमरोहवी
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मदरसा मेरा मेरी ज़ात में है
ख़ुद मोअल्लिम हूँ ख़ुद किताब हूँ मैं
साक़ी अमरोहवी
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