में अब तक दिन के हंगामों में गुम था
मगर अब शाम होती जा रही है
साक़ी अमरोहवी
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में अब तक दिन के हंगामों में गुम था
मगर अब शाम होती जा रही है
साक़ी अमरोहवी
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मुझ को क्या क्या न दुख मिले 'साक़ी'
मेरे अपनों की मेहरबानी से
साक़ी अमरोहवी
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तू नहीं तो तिरा ख़याल सही
कोई तो हम-ख़याल है मेरा
साक़ी अमरोहवी
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तू नहीं तो तिरा ख़याल सही
कोई तो हम-ख़याल है मेरा
साक़ी अमरोहवी
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ज़िंदगी भर मुझे इस बात की हसरत ही रही
दिन गुज़ारूँ तो कोई रात सुहानी आए
साक़ी अमरोहवी
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आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो
रूह में रौशनी लहजे में चमक पैदा हो
साक़ी फ़ारुक़ी
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