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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम
हर बात में क़ुरआन उठाया नहीं जाता

सख़ी लख़नवी




'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से
बड़ी भीड़ होगी कुचल जाइएगा

सख़ी लख़नवी




'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से
बड़ी भीड़ होगी कुचल जाइएगा

सख़ी लख़नवी




शैख़-जी बुत की बुराई कीजे
अपने अल्लाह से भरपाइगा

सख़ी लख़नवी




शम्अ को रौशनी का अपने बहुत दावा है
साक़-ए-पा से कुछ उठा लीजिए दामाँ अपना

सख़ी लख़नवी




शम्अ को रौशनी का अपने बहुत दावा है
साक़-ए-पा से कुछ उठा लीजिए दामाँ अपना

सख़ी लख़नवी




सीने से हमारा दिल न ले जाओ
छुड़वाते हो क्यूँ वतन किसी का

सख़ी लख़नवी