रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम
हर बात में क़ुरआन उठाया नहीं जाता
सख़ी लख़नवी
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'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से
बड़ी भीड़ होगी कुचल जाइएगा
सख़ी लख़नवी
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'सख़ी' बैठिए हट के कुछ उस के दर से
बड़ी भीड़ होगी कुचल जाइएगा
सख़ी लख़नवी
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शैख़-जी बुत की बुराई कीजे
अपने अल्लाह से भरपाइगा
सख़ी लख़नवी
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शम्अ को रौशनी का अपने बहुत दावा है
साक़-ए-पा से कुछ उठा लीजिए दामाँ अपना
सख़ी लख़नवी
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शम्अ को रौशनी का अपने बहुत दावा है
साक़-ए-पा से कुछ उठा लीजिए दामाँ अपना
सख़ी लख़नवी
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सीने से हमारा दिल न ले जाओ
छुड़वाते हो क्यूँ वतन किसी का
सख़ी लख़नवी
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